स्वामी विवेकानंद का दिव्य चरित्र part-3

समस्त विश्व की नजरों में हिंदुस्तान की धरती की महानता,संस्कृति,सभ्यता,वेदांग ओर ग्रंथो का महत्व समझाया हो ओर अपने हिंदुस्तान का सम्मान कराया (respect)हों,वो थे युगपुरुष स्वामी विवेकानंद। 


स्वामीजी ने धर्म के प्रति लोगो को जागृत किया और एक नई राह दिखाई है।सदैव समाज के हित में ही काम किया है।स्वामीजी ने देश - विदेशों में हिंदू धर्म को प्रसिद्ध किया है और हिंदू धर्म के प्रति लोगो को आकर्षित किया है।उनका आध्यात्मिक ज्ञान,व्यक्तित्व,उनके विचार हमेशा लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत रहेंगे।इस लेख में स्वामी विवेकानंद के जीवन के कुछ अंश के बारे मे बताया गया हैं।

रामकृष्ण परमहंस की बीमारी

नरेंद्रनाथ ने रामकृष्ण परमहंस से 1881 - 1886 तक "अद्वैत वेदांत" का ज्ञान प्राप्त किया था।इन पांच सालों में गुरु देव से विवेकानंद ने अपनी योग्यता के आधार पर आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की।25 फरवरी,
1884 को उनके पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु होने के बाद घर का पालनपोषण करना मुश्किल हो गया था,आर्थिक कष्ट का सामना करना पडा था,फिर भी विवेकानंद ने अपनी पर आई जवाबदारियों को अच्छी तरह निभाया।इन कठिन परिस्थिति में भी उनके विवेक और वैराग्य में तनिक कमी भी ना आई।

स्वामी विवेकानंद के ऊपर से पिता का छाया उठने के बाद इन सब परिस्थितियों के बीच,सन् 1885 में उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस को जब गले का सूजन हो जाता हैं और वे चिकित्सक को दिखाते हैं,तब चिकित्सक ने गुरु को गले का कैंसर के बारे मे बताते हैं।चिकित्सक ने गुरु से कहा की आप समाधी और वार्तालाप मत करिए,फिर भी वे मुस्कुराते रहे।चिकित्सा के लिए उनको पहले श्यामपुर और बाद में कोसिपोर में एक किराए के मकान में लाया गया।रामकृष्ण परमहंस अपनी चिकित्सा कराने के रोकने पर भी विवेकानंद अपने गुरु का ईलाज करवाते रहते थे और अपनी घर की नाजुक हालत की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहते थे।गुरु देव का शरीर अत्यंत ऋण हो गया था।कैंसर के कारण गले में थूक,रक्त,कफ निकलता था।इन सबकी सफाई में नरेंद्र खूब ध्यान दिया करते थे।

गुरु के प्रति निष्ठा

एक बार गुरुदेव की सेवा में किसी शिष्य ने घृणा और लापरवाही दिखाते हुए नाक-भौं सिकोडी।यह देखकर विवेकानंद को गुस्सा आया और अपने गुरु भाई को पाठ पढाया,फिर गुरु देव की प्रत्येक वस्तु प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त,कफ आदि से भरी थूकदानी को उठाकर फेकते दिया।यह सब देखते ही बाकी सब चौंक जाते थे।क्यूंकि,किसी के लिए इतनी निष्ठा प्रेम होना बहुत नया था।

रामकृष्ण परमहंस को यह एहसास हो जाता हैं की वे लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाएंगे।गुरु रामकृष्ण परमहंस नरेंद्र से अधिक लगाव रखते थे और उनको अपने बच्चे की तरह मानते थे।विवेकानंद गुरु की अधिक सेवा करते थे।वे गुरुदेव को समर्पित थे।गुरु देव विवेकानंद को बुलाकर कहते हैं,की मेने सब शिक्षा और ज्ञान तुम्हें दिया और तुम्हें इन ज्ञान को फैलाकर एक अच्छा राष्ट्र बनाना हैं और युवानों को जगाकर नई राह दिखानी हैं।अपने गुरु भाई का भी तुम्हे ध्यान रखना हैं।

गुरुदेव के त्याग के दिनों में उन्होंने नरेंद्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।गले का कैंसर के कारण गुरु देव ने 16 अगस्त,1886 को सवेरा होने से कुछ वक्त पहले देह को त्यागकर महासमाधि में लीन हो गए।

गुरु देव की मृत्यु होने के बाद स्वामीजी बहुत रोए।जब उनके साथ उनके गुरु होते थे तब उनको एक अलग ताकत का ही अहसास होता था।

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही अपने गुरु के शरीर और अपने दिव्यतम आदर्शो की उत्तम सेवा कर सके।गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके।

रामकृष्ण मठ

गुरू रामकृष्ण परमहंस के मृत्यु होने जाने के बाद नरेंद्र और उनके साथियों ने वराहनगर में संन्यास ग्रहण किया।नरेंद्र ने अपने गुरु के आज्ञा अनुसार अपने साथियों को आदर्श कर्मयोगी की तरह विश्वमानव कल्याण के लिए प्रोत्साहित किया।विवेकानंद ने वराहनगर में रामकृष्ण संघ की स्थापना की।हालांकी बाद में इसका नाम रामकृष्ण मठ कर दिया।

भारत भ्रमण

कुछ वक्त के लिए विवेकानंद तपस्या में विलीन रहने के लिए हिमालय चले गए।लेकिन भारत की उस समय की दुर्दशा ठीक नहीं थी।जात-पात,धर्म,ऊंच-नीच,भेदभाव की स्थिती थी।इन सब स्थिती के कारण वो जल्दी ही तपस्या को छोडकर पूरे भारत की पैदल चलकर यात्रा करने का निश्चय किया।जिसे "परिव्राजक" के रूप में माना जाता हैं।

सन् 1890 में अज्ञातवास में रहकर स्वामी जी भारत भ्रमण की यात्रा पर निकल पडे।अपनी यात्रा के दौरान वे आगरा,वाराणसी,अयोध्या,अलवर और वृदावन आदि स्थानों पर गए।इस यात्रा के दौरान वे राजाओं के महलों में और गरीबों की जोपडीयों में भी रहे।अपनी यात्रा के दौरान वे भारत की गरीबी,जात-पात,ऊंच-नीच,भेदभाव को देखकर अत्यंत दुखी हुए।इससे उन्हों भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगो की रहनीकरणी ओर उनके बीच में चलते भेदभाव और समाज में जात - पात के नाम पर फैली तानाशाही के बारे में जानकर उन्हें ये समझ आया की भारत में चलते जातपात और भेदभाव को दूर करने के लिए और एक अच्छा राष्ट्र का निर्माण करने के लिए इन सभी बुराइयों को खत्म करना होगा।

स्वामीजी संपूर्ण देश का भ्रमण करने के बाद छोटे-मोटे सैंकडों प्रसिद्ध व्यक्तियों से वार्तालाप करके इसी निश्चय पर पहुंचे की एक बार देश से बहार जाकर हिंदू धर्म के उच्च सिद्धांतो का प्रचार-प्रसार किया जाए।ताकि विदेशों के आध्यात्मिक प्रेमी भारतवर्ष तरफ आकर्षित हों।दूसरी और हमारे देश बंधु विदेशी सभ्यता से आकर्षित होकर अपनी प्राचीन संस्कृति से विमुख हो जाते है उनकी भी आंखे खुले।इसी अवसर पर मद्रास में उनको यहीं सूचना मिलती हैं की अमेरिका के शिकागों नगर में एक सर्व-धर्म सभा होने वाली हैं और उसमें अभी तक सनातन हिंदू धर्म की और से कोई प्रतिनिधि नहीं गया।स्वामीजी को ऐसा प्रतीत हुआ की क्योंना इसी अवसर पर अन्य धर्म वालो के समक्ष हिंदू धर्म को प्रसिद्ध किया जाए ओर हिंदू धर्म के झंडे को ऊंचा करना चाहिए।उनके सभी मित्रों और शुभचिंतकों ने स्वामीजी के प्रस्ताव को समर्थन किया और 31 मई 1893 के दिन विदेश जाने का निश्चय किया।

नरेंद्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद बनने की कहानी

जिस समय स्वामीजी यात्रा के लिए धन की व्यवस्था कर रहे थे उसी दौरान खेतडी के दीवान जगमोहनलाल उनकी सेवा में उपस्थित हुए।उन्होंने कहा की,"आपने दो वर्ष पहले राजा साहब को पुत्र होने का आशीर्वाद दिया था,वो सफल हो गया है इस खुशी के मौके दौरान राजा साहब ने आनंदोस्त्व आयोजित किया हैं और उसमें पधारने की महाराज ने आपसे प्रार्थना की हैं"।प्रार्थना का स्वीकार करते हुए स्वामीजी खेतडी पहुंचे और खेतडी के नरेश ने स्वामीजी का आदर सम्मान किया।स्वामीजी ने नवजात शिशु को आशीर्वाद दिया और राजा ने कुछ दिनों के लिए स्वामीजी को वहां रुकने का आग्रह किया और स्वामीजी कुछ दिनों के लिए वहां रुके।इन बीच स्वामीजी और खेतडी के राजा अजीत सिंह के बीच घनिष्ठ दोस्ती हुई।जब स्वामी जी अपनी यात्रा के लिए वहां से रवाना हों रहें थे,तब खेतडी के राजा ने अपने दीवान को उनके साथ भेजा और उनको यात्रा का पूरा प्रबंध और मार्गव्यय आदि की व्यवस्था करने को कहा।

खेतडी के राजा अजीत सिंह स्वामी जी को जयपुर स्टेशन तक विदा करने के लिए आए। मार्ग में चलते-चलते राजा ने स्वामीजी को पूछा की,"आप अमेरिका जाकर कोन से नाम से प्रचार कार्य करेंगे?"स्वामीजी ने उत्तर दिया की अभी तक तो मैने कोई पक्का नाम नही सोचा हैं,कभी तो में सच्चिनानंद,कभी अन्य नाम सोचता फिरता रहता हूं।उसी समय राजा साहब ने कहा - स्वामीजी ! आपको "विवेकानंद" नाम केसा लगता हैं?स्वामी जी ने कहा की यह नाम अच्छा हैं और में इसी नाम से प्रचार कार्य करूगा।उसी वक्त से रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य नरेंद्रनाथ दत्त स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए।

यह नाम दो शब्दों को जोडकर बना हैं 'विवेक+आनंद'. जिसमे विवेक का अर्थ 'बुद्धि' और आनंद का अर्थ 'खुशियां' होता हैं।

स्वामीजी को सबसे पहले शिकागों में आयोजित होने वाली विश्व धर्म सभा में जाने का सुझाव दक्षिण गुजरात के काठियावाड के लोगों ने दिया।फिर,चेन्नई के उनके शिष्यों ने भी ये सुझाव दिया।विवेकानंद जी ने खुद लिखा था कि तमिलनाडु के राजा भास्कर सेतुपति ने भी पहले यह सुझाव दिया था।

प्रथम विदेश यात्रा

जयपुर से बम्बई जाते हुए आबूरोड स्टेशन पर उनको अपने गुरु भाई स्वामी तुरियानांद से भेट हो गई।उनसे बात करते हुए स्वामीजी ने कहा की में आपका धर्मकर्म को अधिक नहीं समझ पाता था।किंतु,अब मेरा हृदय विशाल हो गया है और मुझे सामान्य लोगों के कष्ट देखकर मेरा हृदय बडा व्याकुल हो जाता हैं।उनके दुखों का मुझे बडा अनुभव होने लगा है।यह कहते कहते स्वामीजी की आखों से आसूं गिरने लगते हैं।स्वामी तुरियानंद इस प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा था - "क्या यह भावना और शब्द बुद्धदेव के से नहीं है? में दीपक के प्रकाश की तरह स्पष्ट देख रहा था की देशवासियों के दुःख के कारण स्वामीजी का हृदय धधक रहा था और वे इस दुर्व्यवस्था का सुधार करने के लिए किसी रामबाण रसायन की खोज कर रहे थे?"

31 मई को स्वामीजी बम्बई के बंदरगाह पर अमेरिका जाने वाले एक जहाज में सवार हो गए। उस समय भगवा रंग का रेशमी लबादा,माथे पर उसी रंग का फेंटा बाधकर वो किसी महाराज की तरह शोभा दे रहे थे।इन सब की व्यवस्था खेतडी के दीवान जगमोहनलाल ने की थी।जगमोहनलाल ओर मद्रास के एक भक्त अलसिंह पेरूमल स्वामीजी को जहाज के दरवाजे तक छोडने आए।थोदी देर बाद जहाज के छूटने का घंटा बजा।दोनो भक्तो ने स्वामीजी के पैर पकडकर आसू भरे नेत्रों से विदा की।जहाज कोलंबो,  पीनांग,सिंगापुर,होगकोंग,नागासाकी,  साका,टोकियो आदि बडे शहेरों से गुजकर अमेरिका के बैंकोवर बंदर पर 25 जुलाई को पहुंचा।

जमशेदजी टाटा से भेंट 

आज हमारे देश के पास इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जैसी संस्था हैं तो इसका श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही जाता हैं।जब विवेकानंदजी शिकागों भाषण देने के लिए जा रहे थे तब,जहाज के सफर में उनकी भेट जमशेदजी टाटा से हुई।दोनो के बीच कई मुद्दो पर बातचीत हुई,जब स्वामीजी को पत्ता चला कि जमशेदजी टाटा कुछ नए बिजनेस आइडिया के लिए अमेरिका जा रहे तब स्वामीजी ने टाटा से कहा की आप भारत में एक अनुसंधान और शैक्षिक संस्था खोलने के अलावा एक स्टील फैक्ट्री की स्थापना करने की सलाह दी।उन्होंने कहा की इस देश के युवाओं का विकास होगा और रोजगार प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।जमशेदजी टाटा को स्वामीजी की बात काफी पसंद आई और उनके पर स्वामीजी की बात का गहरा प्रभाव पडा।टाटा ने इन दोनों मोर्चों पर काम करने की ठान ली।उस पर अमल करते हुए उन्होंने "इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस "की स्थापना की और स्टील फैक्ट्री की भी स्थापना की।

शीकागो शहर में स्वामीजी को क्या क्या कष्ट उठाने पडे?

स्वामीजी बैंकुवर बंदर से रेल मार्ग द्वारा 30 जुलाई को शिकागों पहुंचे।शिकागों जाकर स्वामीजी को पत्ता चला की धर्म सभा तो सितंबर में होने वाली हैं।शिकागाें में इतनी ठंड थी की उसके बारे में स्वामीजी बताते हुए कहते हैं की मेरी हड्डियो तक जम गई थी।उन्होंने फिर आगे लिखते हुए कहा है की - "शायद मेरे साथियों को नॉर्थ अमेरिका की ठंड के बारे में अनुमान नहीं था।इसीलिए मेरे पास जो कपडे थे,वो इतनी ज्यादा ठंड सहन करने के लिए अनुकूल नहीं थे।

स्वामीजी आगे बताते है की उस समय शिकागो एक महंगा शहर था।शिकागो जेसे खर्चीले शहर में होटल में रहनेलायक धन नहीं था मेरे पास।इसीलिए बोल्टन चला गया।वहां एक भद्र महिला से परिचय हुआ।उन्होंने आदरपूर्वक उनके घर में रहने दिया। उस शहर में अपनी पोशाक के कारण रहने में असुविधा होने लगी।

मेरी वेशभूषा को देखकर वहां के बच्चे मेरे पीछे भागते थे।वहां के लोगो पीछे से हूरें-हूरें जैसा शोर मचाते थे और मेरी वेशभूषा को देखकर मेरा अपमान कर रहे थे।वहां पर रहते हुए एक समय ऐसा भी आया की मुझे भीख भी मांगनी पडी।लेकिन मेरी वेशभूषा को देखकर मुझे हर दरवाजे पर तिरस्कार मिलता था।

स्वामीजी आगे बताते है,उस समय मेरी हालत खराब हो गई थी,एक बार तो मुझे ऐसा लगा की मैं सब कुछ छोडकर वापस अपने देश चला जाऊ।लेकिन मुझे उन हजारों देश वासियों की याद आई जो भूख से तडप रहे है।वो सब लोग मुझे दिलों जान से चाहते है और मुझ पर विश्वास करते हैं।एक दौर ऐसा भी आया की ठंड से बचने के लिए मुझे मालगाडी के खाली डिब्बों में भी सोना पडा।इसीलिए स्वामीजी इन सभी परिस्थितियों से डरे नहीं ओर इनका सामना किया और वहां पर ही डटे रहें।

स्वामीजी की वेशभूषा की दिक्कत से बचने के लिए उस महिला ने स्वामीजी को सलाह दी की सामान्यत: आप यहीं की पोशाक पहना कीजिए।स्वामीजी संन्यासी होने पर भी रूढीयों के गुलाम नहीं थे।स्वामीजी के पास धीरे - धीरे धन भी खत्म होने लगा था।इसलिए वे धैर्यपूर्वक कठिनाईयों को सहन करने लगे और दिन बिताने लगे।इतने में स्त्रियों की एक संस्था ने उनको अपने यहां व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया।स्वामीजी ने व्याख्यान दिया ओर उससे जो भी धन इकट्ठा हुआ उससे स्वामीजी ने एक अमेरिकन पोशाक बनवाई।तब से स्वामीजी ने गेरुआ वस्त्रों सिर्फ भाषण देने के लिए ही इस्तमाल किया।

बोल्टन में जॉन हेनरी राइट से भेंट

शिकागो जाने के बाद स्वामीजी को पता चला की धर्म सभा में भाषण देने के लिए आधिकारिक अनुमति की जरूरत पडेगी। बोल्टन में स्वामीजी की मुलाकात हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से हुई। राइट ने स्वामीजी को भाषण देने के लिए आमत्रित किया।उनके भाषण से वह काफी प्रभावित हुए।जब राइट को पत्ता चला की विवेकानंद के पास धर्म संसद में शामिल होने के लिए आधिकारिक अनुमति नहीं है और कोई परिचय पत्र भी नहीं हैं।उन्होंने कहा,आपका परिचय पत्र मांगना ठीक उसी तरह है जेसे सूर्य को स्वर्ग में चमकने के लिए उसके अधिकार मांगना हैं।

शिकागो वापस आने के बाद भी उनकी कठिनाईयों का अंत नहीं हुआ।शिकागो वापस आने पर एक दिन उनको स्टेशन पर खाली डिब्बे पर एक रात काटनी पडी।उनका धैर्य फिर भी सहायक बना रहा और सब तरह की बाधाओं को पार करके वे धर्म सभा के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में सम्मलित होने में सफल हो गए।

सर्व धर्म - सम्मेलन(शिकागो)

11 सितंबर 1893 को सर्व धर्म-सम्मेलन का उदघाटन शिकागो में हुआ।विभिन्न देशों के प्रतिनिधी तथा शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति "आर्ट पेलेस " (कला मंदिर) के विशाल हॉल में एकत्रित हुए।ये सभा 11 सितंबर से 27 सितंबर तक चली।इस सभा में एक जगह पर कई धर्मगुरुओं ने अपनी किताब रखी,वहीं भारत के धर्म के वर्णन के लिए स्वामीजी ने श्रीमद् भगवत गीता रखी।जिसका खूब मजाक उडाया गया।फिर,स्वामीजी की भाषण देने की बारी आई तब भारत के धर्म की एक नई छबि बनाई और उनका सम्मान भी करवाई और स्वामीजी भी प्रसिद्ध हो गए।

इस सभा में हिस्सा लेने वाले प्रत्येक प्रतिनिधी अपने अपने धर्म की महत्ता सिद्ध करने के लिए उत्सुक था और इस उद्देश्य से कई दिनों से अधिक प्रभावशाली भाषण देने के लिए तैयारी कर रहा था।किंतु,स्वामीजी ने इस प्रकार की कोई तैयारी करने का अवसर ही नहीं प्राप्त हुआ।सभा में स्वामीजी सबसे पीछे बैठकर ईश्वर चिंतन कर रहे थे।

अंत में दस का घंटा बजा।ईसाई पादरी अनुभव करने लगे की जगत में ईसाई धर्म सर्वश्रेष्ठ है - इस तथ्य को दुनिया के सामने प्रकट करने का समय आ पहुंचा है।वास्तव में किसी को खबर नहीं थी की यह घंटा सनातन हिंदू धर्म का बज रहा हैं।

यूरोप - अमेरिका के लोग उस समय भारत को हीन दृष्टि से देखते थे।वहां लोगो ने बहुत प्रयत्न किया की स्वामीजी को सर्वधर्म सम्मेलन में भाषण देने का समय ही ना मिले।किंतु,एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोडा समय मिला।

सर्वधर्म सम्मेलन में स्वामीजी का भाषण

स्वामीजी ने गुरुदेव और सरस्वती को प्रणाम करते हुए बोलना आरंभ किया।

"मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों"

 इन भाईयो और बहेनो शब्द को सुनते ही सभा में उत्साह का तूफान आ गया।सबके मुख से लेडीज एंड जेंटलमैन के बाह्य शिष्टाचार युक्त शब्द को सुनते सुनते जब उनके कान में भाईयों और बहिनों जैसे आत्मियपूर्ण शब्द पड ते ही होल में बैठे लोगों ने तालियों बजाते हुए खडे हो गए।ये सब देखकर स्वामीजी चकित हो गए।कई मिनिटो तक होल में तालियों बजती रहीं।

अंत में लोगों के शांत रहने पर स्वामीजी ने कहा - आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया हैं।मैं दुनिया की सबसे पुरानी परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हुं।सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों करोडों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार वक्त करता हूं।

◕➜मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं,जिन्होंने यह जाहिर किया की दुनिया में सही‌ष्णूता का विचार पूरब के देशों से फेला हैं।

◕➜मुझे गर्व है की में उस धर्म से हुं जिसने दुनिया को सही‌ष्णूता ओर सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढाया हैं।हम सिर्फ सार्वभौमिक सही‌ष्णूता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि,हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।

◕➜मुझे गर्व है कि में उस देश से हु जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी।मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की पवित्र यादें को संभालकर रखी है, जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस - नहस कर दिया था,फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी।

◕➜मुझे गर्व है कि में एक ऐसे धर्म से हु जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी हैं और अब भी उनकी लगातार मदद कर रहा हैं।

◕➜मैं इस मौके पर एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहता हूं जो मैने बचपन से स्मरण किया और जिसे रोज करोडों लोगों स्मरण कर रहे हैं,"जिस तरह अलग - अलग जगह से निकली नदियां,अलग - अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं,ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग - अलग रास्ते पे जाकर अंत में सभी मुझ तक ही पहुंचता हैं।

◕➜मौजूदा सम्मेलन जो की आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है,अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है। " जो भी मुझ तक आता है,चाहे कैसा भी हो,मैं उस तक पहुंचता हूं।लोग अलग - अलग रास्ते चुनते हैं,लेकिन आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।

◕➜सांप्रदायिकता,कट्टरता और इसके भयानक वंशजो के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड रखा है।उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी बार यह धरती खून से लाल हो चुकी हैं। न जाने कितनी सभ्यताएं तबाई हुई और कितने देश मिटा दिए गए। 

◕➜यदि ये खौफनाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कही ज्यादा बेहतर होता, जितना की अभी हैं।लेकिन उनका वक्त अब पूरा हो चुका है।मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का निर्णायक सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा।चाहे वो तलवार से हो या फिर कलम से।

स्वामी विवेकानंद ने इस भाषण में जहां वैदिक दर्शन का ज्ञान था। वहीं,दुनिया में शांति से जीने का संदेश भी छुपा था।अपने भाषण में कट्टरवाद और सांप्रदायिकता पर स्वामीजी ने जमकर प्रहार किया था।

जाने किसका हिस्सा था सर्व धर्म सम्मेलन

साल 1893 का सर्व धर्म सम्मेलन कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज करने के 400 साल पूरे होने पर आयोजित विशाल विश्व मेले का एक हिस्सा था।अमेरिकी नगरों में इस आयोजन के लिए इतनी होड थी की अमेरिकी नगरों जेसे न्यूयॉर्क,वॉशिंगटन,सेंट लुई और शिकागो के बीच मतदान कराना पडा,जिसमे शिकागो को बहुमत मिला।इसलिए फिर तय हुआ की सर्व धर्म सम्मेलन का आयोजन शिकागो में होगा।

मिशिगन झील के किनारे 1037 एकड जमीन पर इस प्रदशनी में 2.75 करोड लोग आए थे।हर दिन डेढ लाख से ज्यादा लोग आते थे।सब देखने के लिए 150 मिल चलना पडता था।

अमेरिका में स्वामी विवेकानंद के आध्यत्मिक कार्य

शिकागो में दिए गए स्वामीजी के भाषण सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए थे।स्वामीजी भी प्रसिद्ध हो गए।फिर तो अमेरिका में उनका स्वागत होने लगा।चारो दिशाओं में " विवेकानंद " छपा था।रास्ते पर चलते अनेक लोगो चित्र के सामने खडे होकर सम्मान प्रदर्शित करते थे। बडे-बडे धनकुबेर उनको अपने महलों में रहने का निमंत्रण देने लगे थे।वहां पर स्वामीजी के भक्तो का बडा समुदाय हो गया।

अमेरिका में स्वामीजी अगले 3 सालो तक वेदांत की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते रहें।वहां के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की ज्योति प्रदान करते रहे।'अध्यात्म विधा और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा ये स्वामीजी का दृढ विश्वास था।अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे।भारत की संस्कृति और गौरव को देश विदेशों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

अमेरिका की प्रेस ने स्वामी विवेकानंद को "cylonic monik from India" का नाम दिया था।इसके बाद स्वामीजी ने 2 साल शिकागो,न्यूयॉर्क,डेट्राइड ओर बोल्टन में लेक्चर दिए।सन् 1894 में न्यूयोर्क उन्होंने "वेदांत सोसाइटी" की स्थापना की।

स्वामीजी का इंग्लेंड में प्रचार कार्य

अमेरिका में प्रचार कार्य करके स्वामीजी इंग्लेंड में प्रचार कार्य करने के लिए गए।उस समय भारत इंग्लेंड के आधीन था।स्वामीजी इंग्लेंड में अपनी योग्यता द्वारा भारत और हिंदू धर्म की श्रेष्ठता का प्रभाव स्थापित करना चाहते थे।स्वामी विवेकानंद दो चार दिन में वहां हिंदू योगी के नाम से प्रसिद्ध हो गए। बडे बडे विद्वान लोग और शिक्षित लोग स्वामीजी से उपदेश सुनने के लिए आने लगे।एक दिन उनका भाषण"पिकेडली प्रिसेंस हॉल" में हुआ।जिसमे अध्यात्म विषयों में रुचि रखने वाले एक हजार से अधिक श्रोता उपस्थित थे।दूसरे दिन लंदन के सभी समाचार पत्रों में इनकी विद्वता के विषय में बडे-बडे लेख प्रकाशित हुए।

'स्टैंडर्ड' नमक प्रसिद्ध पत्र ने लिखा की "बहुत दिनों से कोई ऐसा शक्तिशाली भारतीय इंग्लैड के व्याख्यान मंच पर खडा नहीं हुआ था।

'क्रानिक' नामक पत्र के संपादक ने लिखा - " लोकप्रिय हिंदू संन्यासी विवेकानंद के अंग-प्रत्यंगो में बुद्धदेव का सादृश्य दिखलाई पडता हैं। वाणिज्य द्वारा प्राप्त हमारी समृद्धि,हमारे रक्त पीपासापूर्ण युद्ध तथा धर्म-प्रचार संबधी असहिष्णुता की खरी आलोचना करने के उन्होंने कहा - इस मूल्य में बिचारे हिंदू तुम्हारी खोखली, आडंबरपूर्ण सभ्यता के प्रेमी न बन सकेंगे।"

उन्होंने वहां पर लोगो को अपने भाषणों में बार बार चेतावनी दी की "यदि शीघ्र उन्नति करने वाली ओर ऊपर से मनोहर दिखाई पडने वाली पश्चिम सभ्यता को वेदांत के त्याग और वैराग्य की नींव पर स्थापित न किया गया तो उसका शीघ्र नाश होना भी अवश्यभावी हैं।सावधान!सारा पश्चिमी जगत एक ज्वालामुखी की ऊपर टिका हुआ है।वह किसी भी समय आग उगलकर तुम्हारा विध्वस्त कर सकता है।अभी भी तुम न चेतोगे तो पचास वर्ष में सर्वनाश का दृश्य दिखलाई देगा। सन् 1896 में कही गई ये भविष्यवाणी गत दो महायुद्धों के रूप में सत्य हो चुकी हैं।

भगिनी निवेदिता 

भगिनी निवेदिता का मूल नाम 'मार्गरेट एलिजाबेथ नोबूल 'था।वे एक अंग्रेज आयरिश सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक,लेखक और स्वामी विवेकानंद की शिष्या थी।स्वामीजी जब लंदन में थे तब भगिनी निवेदिता की मुलाकात स्वामीजी से हुई।स्वामी विवेकानंद के प्रभावशाली व्यक्तित्व,स्वभाव और उनकी भाषणशैली से प्रभावित होकर स्वामीजी को आध्यात्मिक गुरु मान लिया और भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया।28 जनवरी,1898 को नोबुल भारत आई।स्वामी विवेकानंद ने नोबेल को 25 मार्च 1898 में विधी के साथ ब्रह्मचारिणी व्रत की दीक्षा देकर मानव कल्याण के लिए भगवान बुद्ध के पथ पर चलने की प्रेरणा दी।दीक्षा के समय स्वामीजी ने उनका नया नाम भगिनी निवेदिता दिया।उन्होंने अपना जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित किया और बुद्धत्व प्राप्त किया।भगिनी निवेदिता ने भारत की आजादी की लडाई लडने वाले देशभक्ति की मदद की ओर भारत में महिला शिक्षा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मेक्स मूलर 

इंग्लेंड में स्वामीजी की मुलाकात मेक्स मूलर से भी हुई।वे एक जर्मनवासी थे जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी थे।वे जर्मन भाषाविद,वेदों के ज्ञाता तथा प्राच्य विद्या विराशद थे।वे पाश्चात्य शैक्षणिक भारतविद्या तथा तुलनात्मक धर्मशास्त्र के संस्थापक थे।उनका संबंध अनेक एशियाई और यूरोपीय संस्थाओं से था।मेक्स मूलर ने ही ग्रामोफोन के आविष्कार के समय पहली आवाज "वेद मंत्र" के रूप में रिकॉड की थी।उन्होंने अपने जीवन में वेदों को खोजकर प्रकाशित किया।स्वामी विवेकानंद ने मेक्स मूलर के बारे में कहा था,"पश्चिमी दुनिया में अगर किसी ने वेदांत के मर्म को समझा है तो वह है मेक्स मूलर"।

पॉल ड्यूसेन

जर्मनी से पॉल ड्यूसेन ने स्वामीजी को निमंत्रण भेजकर अपने यहां बुलाया। पॉल ड्यूसेन महान जर्मन दार्शनिक और भारतीय विद्वान थे। पॉल ड्यूसेन स्वामीजी को अपने यहां बुलाकर कई दिनों ज्ञानचर्चा की।उसको पहली बार किसी हिंदू योगी की एकाग्रता,बोध क्षमता और सयंम शक्ति का अनुभव हुआ।

एक बार ऐसा हुआ की स्वामीजी और पॉल ड्यूसेन अध्ययन कक्ष में बैठे किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे।इसी बीच टेबल पर रखी एक किताब पर स्वामीजी की नजर गई और वह किताब को पढने के लिए उनसे केवल एक घंटे के लिए मांगी।लेकिन,स्वामीजी की यह बात कर ड्यूसेन आश्चर्यचकित हो गए।इसका कारण था की वह किताब पॉल ड्यूसेन कहीं दिनों से पढ रहे थे,फिर भी वह किताब उनको समझ नहीं आई थी।इसीलिए ड्यूसेन ने स्वामीजी को कहा की,"क्या आप यह किताब सिर्फ एक घंटे में पूरा पढ लेगे?","में यह किताब को अभी तक समझ नहीं पा रहा हूं,जबकि मुझे यह किताब को पढने के लिए काफी दिन बीत चुके हैं।यह बहुत उच्च स्तर की किताब हैं और इस किताब को समझना बहुत कठिन हैं।"फिर वह किताब स्वामीजी को दी।स्वामीजी ने वह किताब को बिना खोले ही किताब को पूरा पढके याद कर लिया।फिर स्वामीजी ड्यूसेन के पास वह किताब लेकर गए और उनको कहा की इस किताब में कुछ खास नहीं है।स्वामीजी का उत्तर सुनकर वह आश्चर्यचकित हो गए।उनको लगा की स्वामीजी शायद जूठ बोल रहे हैं या तो अपने ज्ञान पे घमंड आ गया है।उनको यकीन नही हुआ की,स्वामीजी ने यह किताब को एक घंटे में पढकर अपनी राय कैसे दे सकते है।जब की यह किताब जर्मन भाषा में थी,किंतु जर्मन भाषा स्वामीजी को आती ही नहीं थी।

फिर,जर्मन दार्शनिक स्वामीजी की परीक्षा लेने के लिए उन्हें वह किताब में से अलग अलग पन्नो में से कुछ प्रश्न पूछना शुरू किया।स्वामीजी ने सभी प्रश्नों के उत्तर सही सही दे दिया।विवेकानंद की मानसिक शक्ति ने उस जर्मन दार्शनिक को आश्चर्यचकित कर दिया।फिर स्वामीजी ने उस जर्मन दार्शनिक को संयम शक्ति,ब्रह्मचर्य और त्याग से मिलने वाली शक्ति के बारे में बताया।

भारत आगमन

स्वामीजी लगभग 4 वर्ष तक यूरोप - अमेरिका में हुंदु धर्म के प्रचार प्रसार कार्य किए और वहां हिंदू धर्म को प्रसिद्ध किया।वहां के लोगों को हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित करके स्वामीजी ने स्वदेश आने का निश्चय किया।16 दिसंबर,1896 को स्वामीजी ने भारत आने के लिए प्रस्थान किया।

जिस समय भारतवर्ष में स्वामीजी के यूरोप से स्वदेश आने के समाचार मिला तब भारत के नगर-नगर में स्वामीजी के स्वागत ओर सम्मान की तैयारी होने लगी। 

स्वामीजी का जहाज जब कोलंबो पहुंचा तब उनका वहां के लोगों द्वारा बंदरगाह पर जोरदार स्वागत किया गया।वहां पर स्वामीजी 2-3 दिन तक रुके।स्वामीजी का विभिन्न संस्थाओं के द्वारा स्वागत होता गया।स्वामीजी काफी लोकप्रिय हो चुके थे।

इसके बाद स्वामीजी रामेश्वर पहुंचे और फिर कलकत्ता चले गए।स्वामीजी का कलकत्ता में बडी धूमधाम से स्वागत किया गया।वहां स्वामीजी का व्याख्यान सुनने के लिए काफी दूर दूर से लोग आते थे।स्वामीजी ने भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में भी भाषण दिया।स्वामीजी हमेशा अपने भाषण में विकास का जिक्र करते थे।स्वामीजी यात्रा के दौरान अनुभव कर चुके थे की भारत में विकास की नई लहर शुरू करनी है तो सबसे पहले जातिवाद को खत्म करना होगा,लोगो को धर्म का सही अर्थ समझना होगा और उनक आध्यात्मिक विकास करना होगा।ये सभी तब संभव हो सकते हे जब एक मिशन की स्थापना कर दी जाए।

रामकृष्ण मिशन

स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के नाम पर 1 मई,1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय कलकत्ता के निकट बेलुड में हैं।इस मिशन का मुख्य उद्देश्य नए भारत का निर्माण करना, लोगो को धर्म के प्रति जागृत करना ओर वेदांत दर्शन के प्रचार-प्रसार कार्य करना हैं।स्कूल,कॉलेज,अस्पताल और साफ सफाई के क्षेत्र में कदम बढाना था।रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्म योग मानता है,जो की हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।रामकृष्ण मिशन का ध्येयवाक्य है - "आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च"(अपने मोक्ष और संसार के हित के लिए) रामकृष्ण मिशन को भारत सरकार द्वारा 1996 में 'डॉ आम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार' ओर 1998 में 'गांधी शांति पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।

बेलुड मठ

बेलुड मठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में हावडा जिले के हुगली नदी के पश्चिमी तट पर बेलूड में स्थित हैं।इस मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1898 में की थी।बेलुड मठ रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय हैं।इस मठ के भवनों की वास्तु में हिंदू,ईसाई तथा इस्लामी तत्वों का मिश्रण हैं।

बेलुड मठ विभिन्न सेवाए जेसे की,स्वास्थ्य सेवाए,शिक्षा, नारी कल्याण,गामविकास,राहत,धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करता हैं।

दूसरी विदेश यात्रा

स्वामीजी का स्वास्थ्य धीरे धीरे निर्बल हो रहा था।फिर भी स्वामीजी का स्वास्थ्य गिरने के बावजूद अपने कर्तव्य पालन में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड रहे थे।स्वामीजी को अमेरिका से बार बार बुलावा आने लगा तो स्वामीजी इस अवस्था में भी अमेरिका जाने के लिए तैयार हो गए।इस बार विदेश यात्रा में स्वामीजी के साथ उनकी शिष्य भगिनी निवेदिता और स्वामी तुरियानंद थे।इस यात्रा में स्वामीजी ने केलिफोर्निया में 'शांति आश्रम' और सेन फ्रांसिस्को में 'वेदांत सोसायटी' की स्थापना की।

स्वामीजी 1900 में धर्म सभा हेतु पेरिस चले गए।यहां उन्होंने "लिंगम की पूजा" और "श्रीमद् भगवद गीता की" सत्यता पर आधारित भाषण दिया।इस सभा के बाद स्वामीजी अनेक स्थानों पर गए।स्वामीजी 9 दिसंबर, 1900 को कलकत्ता वापस लोट आए।फिर,स्वामीजी बेलूड मठ में गए।यहां स्वामीजी को मिलने के लिए साधारण जनता से लेकर राजा और राजनैतिक नेताओं भी आते थे।

स्वामीजी का स्वास्थ्य और बिगडता चला गया।फिर भी, स्वामीजी ने 1901 में वाराणसी और बोध गया की यात्रा की।

मृत्यु

स्वामीजी अस्थमा,डायाबिटिस जैसी बीमारियों से ग्रसित हो गए।इसीलिए,स्वामीजी अपने मठ के कार्यक्रमों से छूटी लेने लगे थे और मठ का भार शिष्यों तथा गुरु भाइयों पर छोडने लगे थे।स्वामीजी आखरी दिनों में बेलुड मठ में ही रहने लगे थे।स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 4 जुलाई,1902 को हुई थी। स्वामीजी के मृत्यु वाले दिन प्रतिदिन की तरह प्रातःकाल में उठे थे।उठने के बाद उन्होंने दिन की शरुआत में तीन घंटे का ध्यान किया।ध्यान करने के बाद स्वामीजी ने छात्रों को शुक्ल यजुर्वेद और योग के सिद्धांत के पाठ पढाए थे।दिन में स्वामीजी ने उनके साथियों के साथ बेलूड मठ में एक वैदिक कॉलेज खोलने के बारे में चर्चा की थी।दरअसल,बेलुड मठ में वैदिक कॉलेज खोलने की प्लानिग पहले से ही चल रही थी।संध्या के समय की आरती हो जाने पर वे अपने कमरे में गए और किसी को डिस्टर्ब करने से मना किया।स्वामीजी कमरे में जाकर ध्यान करने के लिए बैठ गए।स्वामीजी ने ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली।बेलूड में गंगा तट पर चंदन की चिता पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया।उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहां एक मंदिर बनवाया ।

निष्कर्ष

यह लेख में हमने स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक जीवन के कुछ अंश के बारे में बताया हैं जो काफी महत्वपूर्ण हैं।स्वामी विवेकानंद के जीवन के बारे में आपको अच्छी और ज्यादा जानकारी मिले एसी हमने पूरी कोशिश की हैं। स्वामी विवेकानंद की जीवनी को हमने 3 पार्ट में बाटा है।हमारा यह लेख पढने के लिए दिल से धन्यवाद।हमारे लेख में हमारी ओर से कोई भी भूल हुई हो तो आप हमे बता सकते हो।













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